Thursday, 29 September 2016

सपनो का शहर शिमला: भाग 2

आपने अब तक पढ़ा कि कल हम कालीबाड़ी मंदिर, मॉल, और रिज गए और लौटते वक्त हमे शाम के 8 बज गए फिर हम खाना खा के सो गए। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

लगभग सुबह 5 बजे उठा तो रजाई से बाहर निकलते ही काफी ठण्ड लगने लगी। लेकिन जल्दी से मुह हाथ धोया और सुबह लगभग 6 बजे ही निकल दिए फिर वही रेलवे स्टेशन तो हमारे रस्ते का मिडवे बन गया था रिज़ पर होते हुए हम पहुच गए जाखू मंदिर के रस्ते पर। मनमोहक द्रश्य से गुजरते हुए हम पहुंचे जाखू मंदिर। इतनी ऊँची मूर्ति मैंने अपने जीवन में पहली बार देखी आनंद आ गया

कहते है कि जब हनुमन जी संजीवनी बूटी लेने के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने ऋषि राक्ष को तपस्या करते देखा। तो वह संजीवनी का पता जानने के लिए इस पर्वत पर उतरे और उन्हें (राक्ष+याक+याकू=जाखू) नाम पड़ा। आप कभी शिमला आयें तो यहाँ जरुर आयें।

रिज पर फहरता भारत की शान तिरंगा 


रिज से पहले मैं 

जाखू का रास्ता 

जाखू मंदिर मार्ग की सीढियों पर मैं 

मंदिर का प्रवेश द्वार पर मैं 




इतने मनमोहक द्रश्य के आप घंटो इन्हें निहारते रहेंगे 

कुछ इन्हें भी जरुर खिला जी हमने तो चने दिए थे 

जय बजरंग बलि 
जाखू के बाद मैं पैदल ही चल पड़ा और पहुँच गयेया इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज यह पहले राष्ट्र्पति निवास हुआ करता था मैं आपको इतिहास के बारे में तो नहीं बताऊंगा लेकिन है इतनी मस्त जगह जिसका कोई जवाब नहीं। इसमें सुन्दर गार्डन है और मियुजियम में कई एतिहासिक जानकारी मिलती है। अंदर फोटोग्राफी मना थी नहीं तो आपको अंदर की फोटो भी दिखाते। 




इसके बाद 103 के पॉइंट तक मैं पैदा आया और यहाँ से पुराने बस अड्डे की बस पकड़ी फिर वहां से विकास नगर जिसको न्यू शिमला भी कहा जाता है वहाँ गया। यहाँ मैं अपने भाई का स्कूल देखने आया था। मतलब जो काम मुझे पहले करना था वो मैं सबसे आखिरी में कर रहा हूँ। यह सरस्वती विद्या मंदिर, हिम रश्मि परिसर बहुत ही सुन्दर स्कूल है यहाँ प्रधानाचार्य जी से बात की तो अब यह फाइनल हो गया की छोटा भाई अब यहीं पढ़ेगा तो प्रिंसिपल साहब ने कहा के सेशन शुरू हो गया है भाई को जल्दी ले आओ





स्कूल देखने के बाद मैं कार्यालय आ गया तो 4 बज रहे थे फिर मैंने प्लान किया कि आज ही दिल्ली के लिए निकलना चाहिए तो लगभग 6 बजे तक नए बास अड्डे से कालका की बस पकड़ी और वहां से कालका मेंल से दिल्ली आ गया
बस इतनी सी थी ये कहानी।



Sunday, 25 September 2016

सपनो का शहर शिमला

सपनो का शहर शिमला

लगभग सुबह 11:30 मैं नाभा हाउस कार्यालय पहुंचा रात जर्नल डिब्बे में फिर सुबह खिलौना ट्रैन में सफर करके काफी थकावट हो गई तो थोड़ा आराम करना तो बनता है। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

लगभग 1 बजे तक सोया फिर भूख लगने लगी हर्षद जी के पास गया तो उन्होंने कहा भोजन कर लो कार्यालय में बढ़िया घिया की सब्ज़ी और रोटी बनी है। वैसे तो मुझे घिया की सब्जी अच्छी लगती है लेकिन अपने धर्मपाल जी ने इतनी बढ़िया सबजी बना रखी थी के, मैं 2 दिन तक लगातार घिया की सब्ज़ी खा सकता हूँ। बस शर्त इतनी है कि सब्ज़ी केवल धर्मपाल जी ने बनाई हो। खाना खा पी कर मैंने हर्षद जी को कहा के भाई ले चलो कही घुमाने तो वो बोले आप तैयार हो जाओ मैं भी 2:30 बजे तक अपना काम निपटा लेता हूँ। मैं नहा धो कर फ्रेश हो गया। शुक्र है कार्यालय पर गर्म पानी का सोलर प्लांट लगा है नहीं तो बस पंचास्नान ही करना पड़ता।

मैं कार्यालय में
फिर 2:30 बजे हम दोनों निकल पड़े थोड़ा ऊपर चले तो फिर रेलवे स्टेशन आ गया। दुबारा रेलवे स्टेशन देखकर अच्छा लगा। हर्षद जी ने बताया अब हम जहाँ भी घूमने जायँगे तो यह स्टेशन मिलेगा ही। बस 103 के पॉइंट पर जायेंगे तो स्टेशन नहीं सिर्फ पटरी मिलेगी। स्टेशन से थोड़ा ऊपर चढ़े तो हाईवे आ गया फिर वहां से बाएं हाथ की और गए तो हिमाचल विधानसभा आई। हर्षद जी हर जगह की जानकारी देते हुए एक गाइड की भांति मुझे शिमला दर्शन करवा रहे थे। और ख़ास बात यह है यहाँ कोई स्वछ भारत अभियान जोरो पर है जिसका ख्याल यहाँ के लोग भलीभांति रखते है।


शिमला विधान सभा के बाहर


कुछ ही मिनटों में हम चहलकदमी करते हुए बड़े डाकघर के पास पहुंचे फिर वहां स्कैंडल पॉइंट गये यहाँ हमे एक बैटनी कैस्टल की हवेली मिली। हर्षद जी ने बताया कि यह हवेली बहुत पुरानी है। देखा तो वहां किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है। लेकिन हम शूटिंग देखने के लिए रुके नहीं और पहुँच गए कालीबाड़ी मंदिर यहाँ लकड़ी की प्रतिमूर्ति के रूप में माँ श्यामला देवी विराजमान है देवी श्यामला को माँ काली का ही अवतार माना जाता है। और कहते है कि शिमला शहर का नाम देवी श्यामला के नाम पर ही पड़ा है बाद में अंग्रेजों ने इसको शिमला कर दिया। श्यामला देवी के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया।

हवेली बैटनी कैस्टल 


माँ श्यामला कालीबाड़ी मंदिर



फिर वहां से नीचे उतर कर हम मॉल रॉड होते हुए रिज की ओर जा रहे है मॉल रॉड एक प्रकार से खरीददारी के लिए मुख्य क्षेत्र है। यहाँ का गोइटी थियेटर एक पुराने ब्रिटिश थियेटर की प्ररिकृति है। यह शिमला का सांस्कृतिक केंद्र बिंदु है। नाभा से यहाँ तक हम काफी चल लिए लेकिन एहसास ही नही हो रहा जैसे हम ज्यादा चलें हो पर मज़ा जरूर आ रहा है इस शहर बारे में नयी नयी चीजे जानने को मिल रही है। कुछ ही देर में हम पहुंचे "रिज़" यह कसबे के बीचोबीच विशाल खुला स्थान है, बहुत लोकप्रिय है और यहाँ से पहाड़ों के मनमोहक नाजारें देखे जाते है। बहुत सुंदर जगह है यहाँ लोग घंटों समय बिताते है। शाम को तो यहाँ लोगों का मेला सा लगा रहाता है। हर्षद जी ने बताया अंग्रेजों के शाशन के समय यहाँ अपने देश के लोगो का मना था। अंग्रेजों का कहना था कि Indians and Dogs are not Allowed मैं यह बात सुनकर चोंक गया। किंतु आज इस जगह पर हमारे देश का तिरंगा झंडा बड़ी शान से लहरा रहा है। हमने तो जोश में आकर भारत माता की जय का जयघोष भी लगाया। कसम से मज़ा आ गया। दिन ढल चुका है लक्कड़ बाजार होते हुए लोअर बाजार में वह सुरंग आई जिसमे से ब्रिटिश शाशन काल में जाने की अनुमति थी मतलब ऊपर मॉल रॉड से रिज कोई नहीं जाता था भारतीय सिर्फ नीचे ही रहते थे।





अपने मित्र हर्षद जी




वह सुरंग जिसमे से ब्रिटिश काल में भारतीय जाते थे

रिज़ पर हमारा कारनामा



फिर हम वापिस रेलवे स्टेशन होते हुए कार्यालय आ गए लगभग 8:00 बज रहे होंगे खाना भी तैयार है। हाथ पैर धोकर खाना खाया अब थकावट भी ज्यादा होने लगी और नींद भी आने लगी कल जाखू मंदिर और एडवांस स्टडी जाना है तो मैं जल्दी ही रिज़ाई में घुसकर सो गया।

अगले भाग में जारी...

Monday, 19 September 2016

दिल्ली से शिमला

जुलाई 2016 का महीना है और छोटे भाई अर्पित का किसी विद्यालय में दाखिला भी करवाना है। घर वालों का कहना है कि किसी आवासीय विद्यालय में ही दाखिला करवाना है।उन्होंने यह भी कहा अगर देहरादून और शिमला में कोई विद्यालय हो तो बहुत अच्छा है.!! अब देहरादून से तो मैंने भी पढाई की है तो क्यों न इस बार छोटे भाई को पढाई के लिए शिमला भेजा जाये.!! तो मैंने वहां के अपने मित्र हर्षद से बात की तो उन्होंने बताया के यहाँ सरस्वती विद्या मंदिर है अच्छा स्कूल है, एक बार आकार देख लो। तो मैंने घर वालों को कहा अगर घर से पाप मम्मी स्कूल देख आये तो अच्छा रहेगा, लेकिन घर वालों ने यह जिम्मेदारी भी मेरी ही लगा दी। अब स्कूल देखने मुझे ही जाना है। तो सोचा इस बहाने घुमक्कड़ी भी हो जायेगी। वैसी भी घुमक्कड़ी तो किसी भी मौके पर की जा सकती है।

मैंने ऐसा तय किया कि आज रात ही शिमला जाऊंगा स्कूल देखने। ख़ास बात यह भी है के अब से पहले मैं कभी शिमला गया भी नहीं हूँ। कब शाम हो गई पता भी नहीं लगा मैंने जल्दी से सामान पैक किया और घर चला गया चांदनी चौक। घर जाकर खाना पीना खाया और लगभग 9 बजे स्टेशन पहुँच गया। अभी ट्रैन नहीं आई 1 घंटे देरी से चल रही है। प्लेटफॉम की सीधी पर इन्तजार करना बहुत बेकार लग रहा है, बार बार मेरी नजर मोबाइल की घडी पर जाती समय पता नहीं क्यों आज शायद धीरे धीरे चल रहा है। खैर ट्रैन आई मेरे पास सामान्य श्रेणी का टिकट है तो सोचा था के ऊपर वाली सीट पर बैठ जाऊंगा लेकिन यह क्या ट्रैन तो खचाखच भरी हुई है। जैसे तैसे एक सीट मिली जिसपर एक युवक सो रहा है उसको उठाया तो उठ नही रहा था। लेकिन मैंने भी ठान ली थी अब तो उसको उठा कर इसी सीट पर बैठना है। उसको धक्का देकर उठाया तो बहस हो गई कहने लगा नहीं हटूंगा जो कर सको कर लो फिर मैंने कुछ नहीं बोला और उसको थोड़ा और धक्का देकर सीट पर बैठ गया। वो थोड़ी देर बड़बड़ा कर चुप हो गया।

उसको पानीपत जाना है अब जब वो पानीपत उतरेगा तो मुझे सोने का सौभाग्य प्राप्त होगा। जैसे तैसे ट्रैन पानीपत पहुंची यहाँ काफी सवारी उतर गई और वह भी उतर गया। कुछ देर बाद नींद रानी ने मेरी आँखों में दस्तक देदी और मैं सो गया।सुबह घडी में 5 बज रहे थे और ट्रैन कालका रेलवे स्टेशन पर खड़ी थी अँधेरे में पहाड़ी पर लोगों के घर चमक रहे थे बिलकुल देखने लायक नज़ारा था इतने में ही लोग कहने लगे भाई जल्दी से उतरो शिमला की टिकट लेकर कालका शिमला टॉय ट्रेन में सीट भी लेनी है। अरे वाह सीट के लिए लोग भाग रहे रहे है। मैंने भी थोड़ा जल्दी में शिमला की टिकट ली और ट्रेन में जब गया तो आसानी से सीट मिल गई।

कुछ ही देर में ट्रेन चलने लगी और लगभग 10 मिनट में ही ट्रेन पहाड़ पर आ गई। 10-15 की स्पीड में चल रही ट्रैन मुझे दिल्ली के बाल भवन की याद दिला रही है मेरा मन तो रेल संग्रहालय  में ही पहुँच गया ट्रैन थोड़ी आगे बढ़ी तो सुन्दर दृश्य दिखने शुरू हो गए, और फिर पहला स्टेशन आया टकसाल और फिर लगातार थोड़ी थोड़ी देर में स्टेशन आने लगे गुम्मन, कोटि, सोनवाडा फिर आया धर्मपुर हिमाचल यहाँ पास ही से इतना बढ़िया नजारा दिखा जिसे देखकर दिल खुश हो गया। पहाड़ पर से ऐसी सड़क दिखी बिलकुल घुमावदार महिंद्रा कार के विज्ञापन में ऐसा नजारा देखने को मिलता था।





आपको थोड़ा इस खिलौना गाडी के बारे में बता देते है। ब्रिटिश शासन की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला को कालका से जोड़ने के लिए 1806 में दिल्ली अंबाला कंपनी को इस रेलमार्ग के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समुद्र तल से 656 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालका (हरियाणा) रेलवे स्टेशन को छोड़ने के बाद ट्रेन शिवालिक की पहाड़ियों के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए 2076 मीटर ऊपर स्थित शिमला तक जाती है।
दो फीट छह इंच की इस नैरो गेज लेन पर 9 नवंबर, 1906 से आजतक रेल यातायात जारी है। कालका-शिमला रेलमार्ग में 103 सुरंगें और 769 पुल बने हुए हैं। इस मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं, जिनमें से सबसे तीखे मोड़ पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है। ख़ास बात यह है के 24 जुलाई 2008 को इस रेल मार्ग को विश्व धरोहर में शामिल किया गया।




खैर धर्मपुर और कुमार हट्टी के बाद आया बड़ोग स्टेशन ख़ास बात यह है कि अंग्रेजों ने इस रेल ट्रैक पर जब काम शुरू किया तो बड़ोग में एक बड़ी पहाड़ी की वजह से ट्रैक को आगे ले जाने में दिक्कतें आने लगीं। एक बार तो हालात यह बन गए कि अंग्रेजों ने इस ट्रैक को शिमला तक पहुंचाने का काम बीच में ही छोड़ने का मन बना लिया। इस वजह से ट्रैक का काम देख रहे कर्नल बड़ोग ने आत्महत्या तक कर ली। उन्हीं के नाम पर आज बड़ोग स्टेशन का नाम रखा गया है। और यहाँ ट्रैन थोड़ी देर तक रूकती है ताकि लोग कुछ खा पी लें। अभी रास्ता और लंबा है तो बिना कुछ खाये पिए शरीर की गाड़ी भी कहा चलती है।

ऐसी छोटी बड़ी कई सुरंग आती है
 बड़ोग के बाद आया सोलन शहर दूर से उस शहर को देखकर दिल खुश हो गया पहाड़ी से चारों तरफ घर ही घर नज़र आ रहे थे। सोलन को मशरूम सिटी भी कहा जाता है और कहते है कि इस शहर का नाम माता शूलिनी के नाम पर सोलन पड़ा। आगे चलते है तो और मनमोहक दृश्य जो सुख का अहसास कराते है जैसे आप कही स्वर्ग की यात्रा कर रहें हो। सोलन के बाद फिर सलोगड़ा, कांडाघाट, कानोह, कैथलीघाट, शोघी और फिर तारादेवी का स्टेशन आया यहाँ माँ तारा देवी का मंदिर है तारा देवी माँ दुर्गा की नौंवी बहन है तथा यह मंदिर हिमाचल के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यहाँ ट्रैन रुक गई पहाड़ी का नज़ारा देखने लायक है मन ने कहा क्यों न कुछ फोटो ली जाये और मैं ट्रैन से उतर कर फोटो लेने लगा, तभी अचानक ट्रैन चल पड़ी अरे थोड़ा दौड़ कर ट्रैन में चढ़ा जिस कारण से अपने स्कूल की याद आ गई  वहां भी हम ब्लू लाइन बसों म भाग- भाग कर बस पकड़ा करते थे।

सोलन शहर




इसके बाद जतोग आया यहाँ से शिमला शहर दिखने लगा वाह क्या जगह है जुलाई में ढंड लगने लगी कुछ ही मिनटों में समरहिल के बाद आया शिमला शहर स्टेशन किसी टूरिस्ट पॉइंट से कम नहीं है।






और वही अपने मित्र हर्षद मिल गए उनके साथ मैं पैदल ही चला स्टेशन से थोड़ा नीचे ही है नाभा हाउस वहां अपना कार्यालय है जहाँ मेरी रुकने की व्यवस्था हर्षद जी ने की। वाह ऐसा घर तो मैंने पहली बार देखा जिसमे ऊपर से नीचे की और जाते है वाह गज़ब।

आगे शिमला में भी कई जगह जाना हुआ अगले भाग में जारी...

Thursday, 8 September 2016

अमरनाथ यात्रा: पिस्सू टॉप से शेषनाग

पिस्सू टॉप की चढ़ाई से घबराकर कपिल खच्चर करता है और कहता है कि पिस्सू टॉप पर मिलेगा। लेकिन वह नहीं मिला हमने उसका पिस्सू टॉप पर भंडारे में नाम भी बुलवाया लेकिन वह नहीं मिला हम यह सोच कर आगे बढ़ गए चलो शेषनाग मिल जाएगा। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।


मन में सिर्फ कपिल ही घूम रहा था हम आगे तो बढ़ रहे थे लेकिन बहुत ही चिंता थी। लेकिन थोड़ी देर बाद जब हम शेषनाग झील पहुंचे तो उसे देख कर मंत्र मुक्त हो गए। बिल्कुल नीला पानी और आसपास ग्लेशियर साथ में कई हजार मीटर ऊंचे पहाड़ ऐसा लग रहा था मानो हम आसमान में हैं और सारी धरती नीचे। जब ऐसा विचार मन में आता है तो मन भी बहुत ऊंची उड़ान भरना शुरू होता है। वह एहसास शब्दों में बयां करने वाला नहीं होता वह तो बस महसूस किया जा सकता है। और मैं भी महसूस कर रहा था।

अमरनाथ यात्रा में इस शेषनाग झील का खासा महत्व है। यह झील चंदनवाडी से लगभग 16 किलोमीटर दूर है। अंकित मैं और प्रमोद पिछले 16 किलोमीटर से लगातार पैदल चल रहे हैं। और एक कपिल है जो अभी युवावस्था में ही है, और वह घबराकर खच्चर पर बैठ कर आगे बढ़ जाता है। खैर.!! यह झील सर्दियों में जम जाती है और कभी-कभी तो  ज्यादा ठंड होने के कारण  यह यात्रा के दौरान भी जमी रहती है। तथा यहां से लिद्दर नदी का उद्गम होता है।

इस झील पर एक पौराणिक कथा भी है कहते हैं भगवान भोलेनाथ जब मां पार्वती को अमर कथा सुनाने अमरनाथ की गुफा में ले जा रहे थे तो वह चाहते थे कि इस कथा को मां पार्वती के सिवा ओर कोई न सुने। तो इसलिए वह अपने सभी सांपो नागों को अनंतनाग में, नंदी को पहलगाम में, चंद्रमा को चंदनवाड़ी में छोड़ देते हैं। लेकिन उनके साथ अभी शेषनाग है और भगवान भोले शंकर शेषनाग को शेषनाग झील में छोड़ते हैं तथा यह जिम्मेदारी लगाते हैं कि जब तक भगवान भोले शंकर मां पार्वती को अमर कथा सुनाकर वापिस ना आए तो वह तब तक किसी को भी शेषनाग झील से आगे ना जाने दें। कुछ लोगों का कहना है कि इस झील में कभी-कभी शेषनाग को देखा गया है और मुझे लगता है शायद ऐसा हुआ भी हो क्योंकि एक तो इस झील का पानी बिल्कुल नीला है दूसरा जब यह झील सर्दियों में जम जाती है तो इसका आकार बीच में शेषनाग की तरह हो जाता है तो इस आधार पर कहा जा सकता है कि वास्तव में इस झील में आज भी शेषनाग निवास करता है।

यहां से अभी बेस कैंप लगभग 3 किलोमीटर दूर है कुछ ही देर में हम शेषनाग पहुंचते हैं और वहां पर कपिल का इंतजार करते हो तथा उसको इधर-उधर ढूंढते हैं लेकिन वह नहीं मिला हमने उसका कई बार भंडारों से नाम भी बुलवाया लेकिन वह नहीं मिला और अब इस सब काम में हमें शाम के 4:00 बज गए आखिर क्या करते अब आगे नहीं जा सकते। दिल टूट सा गया क्योंकि हमने तय किया था की आज शेषनाग पार तो कर ही रहेंगे और रात पंचतरणी में ही बिताएंगे लेकिन ऐसा हो न सका। खैर हमने तंबू लिया सामान रखा पर चले गए भंडारों में खाना खाने। जब हम भंडारे से खाना खाकर वापस तंबू में आ रहे थे तो हमें एक std दिखी यहां से मैंने अपने घर फोन किया तो पता चला कपिल तो पंचतरणी पहुंच गया और कल बाबा के दर्शन करके सीधा अंकल के घर ही मिलेगा। तो ज्यादा बात ना करते हुए मैंने फोन रख दिया। लेकिन बहुत गुस्सा आ रहा था क्योंकि उसने बोला था कि हम पिस्सू टॉप मिलेंगे। तो उसने वादा खिलाफी की। खैर कोई बात नहीं अब हम निश्चिन्त हो गए चिंता जो चिता के सामान होतो है वह हमसे दूर हो गई। बस फिर क्या था हम तंबू में आकर सो गए।

शेषनाग झील

छोटी छोटी धाराएं

तम्बू नगरी जहाँ गड़रिये, चरवाहे रहते है

दूर दूर तक भयंकर ग्लेशियर

शेषनाग से निकलती लिद्दर नदी की धारा

शेषनाग झील के पास लगा भंडारा


अगले भाग में जारी...