Monday, 29 August 2016

सम (सैंड ड्यून्स) रेगिस्तान जैसलमेर







इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

सुबह से हम बेफ़िक्रों की तरह घूम रहे हैं, बहुत ज्यादा थकावट भी होने लगी है आराम करने का मन करने लगा है लेकिन हमारे पास समय भी बहुत कम है। तो इसलिए आराम करना वाजिफ नही। हम कुलधरा से सम (सैंड ड्यून्स) के लिये निकल पड़े।




थोड़ी देर बाद हम सैंड ड्यून्स पहुंचे। वहां पहुंचते ही मेरी तो सारी थकावट दूर हो गई। वहां हर शाम रिसॉर्ट्स में राजस्थानी लोक नृत्य का दिल को छू लेने वाला आयोजन होता है। लेकिन मैंने राजेश को आराम करने नहीं दिया।



अभी तेज धूप हो रही है गर्मी भी काफी लग रही है, ऊंट की सफारी करते है। वो बोला अभी धूप तेज है थोड़ी देर बाद करेंगे। लेकिन मैं नहीं माना और ले गया उसको धूप में ही ऊंट की सफारी करने।



ऊंट वाले ने हम दोनों से 100 रू लिए और काफी दूर तक ऊंट की सफारी कराई। हमने धूप में ही ऊपर कुछ फोटो खींची। और थोड़ी देर बाद आराम करने लगे। अब शाम हो गई है। और यहाँ से सूर्य अस्त होता हुआ बहुत ही आकर्षक लगता है। हज़ारों सैलानी यह सूर्यास्त देखे बिना नहीं जाते।











samsandदूर दूर तक फैला रेगिस्तान










img-20150411-wa0008ऊंट पर मैं










img-20150411-wa0032मैं और राजेश धूप में भी मस्ती करते हुए







img-20150411-wa0030वाह मज़ा आ गया










img-20150411-wa0037रेत पर अपने नाम का पहला अक्षर लिखा मैंने




तो इस सबमे हम कैसे पीछे रह जाते हम भी दुबारा बैठ गए ऊंट पर उसकी सफारी से सूर्यास्त देखने के लिए चलो अब बहुत हो गया अब सवारी कह देते है। दूर दूर तक रेगिस्तान है। ऊंट वाला हमे Sun Set point पर ले गया। वास्तव में नज़ारा देखने लायक है मज़ा आ गया। उसके बाद फिर कुछ फोटो खींचे।









img-20150411-wa0035राजेश और मैं ऊंट की सफारी करते हुए










20150409_185538सूर्यास्त का मस्त नजारा




और जब ऊंट की सफारी ओह सवारी करके वापिस आये तो रिसोर्ट में कलाकारों द्वारा आरती उतार कर टीका लगा कर हमारा स्वागत किया गया। जैसे अपने घर में शादी वाले दिन आते है तो माँ आरती उतार कर स्वागत करती है। इस सब के बाद हम अंदर गये। देखा तो राजस्थानी लोक नृत्य का मंच सज चूका था। थोड़ी देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है। जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ राजस्थानी गीतों पे पायल छमछमाने लगी। अलग अलग कलाकारी हो रही है। अरे यह क्या हाथ में आग उठा ली और हाथ जला भी नहीं। यह देखकर तो मैं कायल हो गया। लगभग डेढ़ घंटे बहुत ही रोमांचकारी कार्यकम चला। उसके बाद राजस्थानी खाना वही हुआ मज़ा आ गया।











3_wबढ़िया व्यवस्था










sam-desert-nightsइतना आकर्षित किया कि पर्यटक खुद भी कलाकारों के साथ झूम उठे




हमे थोड़ी जल्दी भी थी लगभग 9 बज गए थे। हम वहां से जल्दी से निकले और पहुँच गए जैसलमेर संघ कार्यालय। वहां थोड़ी देर आराम किया और वहाँ के कार्यकर्ता नरेश जी दिनेश जी आदि हम छोड़ने स्टेशन तक पैदल शॉर्टकट रस्ते से लेकर गए हम लगभग 15 मिनट में स्टेशन पहुंचे। ट्रैन प्लेटफॉम पर लगी हुई थी। उसमे बैठे और पता ही नहीं लगा कब ट्रैन चल दी और हम रात भर सोये और अगले दिन शाम तक दिल्ली आ गए।


यह यात्रा हमारी बहुत ही मज़ेदार रोचकता से भरपूर नए अनुभवों के साथ पूरी हुई।

सम (सैंड ड्यून्स) रेगिस्तान जैसलमेर

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सुबह से हम बेफ़िक्रों की तरह घूम रहे हैं, बहुत ज्यादा थकावट भी होने लगी है आराम करने का मन करने लगा है लेकिन हमारे पास समय भी बहुत कम है। तो इसलिए आराम करना वाजिफ नही। हम कुलधरा से सम (सैंड ड्यून्स) के लिये निकल पड़े।


थोड़ी देर बाद हम सैंड ड्यून्स पहुंचे। वहां पहुंचते ही मेरी तो सारी थकावट दूर हो गई। वहां हर शाम रिसॉर्ट्स में राजस्थानी लोक नृत्य का दिल को छू लेने वाला आयोजन होता है। लेकिन मैंने राजेश को आराम करने नहीं दिया।


अभी तेज धूप हो रही है गर्मी भी काफी लग रही है, ऊंट की सफारी करते है। वो बोला अभी धूप तेज है थोड़ी देर बाद करेंगे। लेकिन मैं नहीं माना और ले गया उसको धूप में ही ऊंट की सफारी करने।


ऊंट वाले ने हम दोनों से 100 रू लिए और काफी दूर तक ऊंट की सफारी कराई। हमने धूप में ही ऊपर कुछ फोटो खींची। और थोड़ी देर बाद आराम करने लगे। अब शाम हो गई है। और यहाँ से सूर्य अस्त होता हुआ बहुत ही आकर्षक लगता है। हज़ारों सैलानी यह सूर्यास्त देखे बिना नहीं जाते। 

दूर दूर तक फैला रेगिस्तान

ऊंट पर मैं

मैं और राजेश धूप में भी मस्ती करते हुए

वाह मज़ा आ गया

रेत पर अपने नाम का पहला अक्षर लिखा मैंने



तो इस सबमे हम कैसे पीछे रह जाते हम भी दुबारा बैठ गए ऊंट पर उसकी सफारी से सूर्यास्त देखने के लिए चलो अब बहुत हो गया अब सवारी कह देते है। दूर दूर तक रेगिस्तान है। ऊंट वाला हमे Sun Set point पर ले गया। वास्तव में नज़ारा देखने लायक है मज़ा आ गया। उसके बाद फिर कुछ फोटो खींचे।

राजेश और मैं ऊंट की सफारी करते हुए

सूर्यास्त का मस्त नजारा



और जब ऊंट की सफारी ओह सवारी करके वापिस आये तो रिसोर्ट में कलाकारों द्वारा आरती उतार कर टीका लगा कर हमारा स्वागत किया गया। जैसे अपने घर में शादी वाले दिन आते है तो माँ आरती उतार कर स्वागत करती है। इस सब के बाद हम अंदर गये। देखा तो राजस्थानी लोक नृत्य का मंच सज चूका था। थोड़ी देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है। जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ राजस्थानी गीतों पे पायल छमछमाने लगी। अलग अलग कलाकारी हो रही है। अरे यह क्या हाथ में आग उठा ली और हाथ जला भी नहीं। यह देखकर तो मैं कायल हो गया। लगभग डेढ़ घंटे बहुत ही रोमांचकारी कार्यकम चला। उसके बाद राजस्थानी खाना वही हुआ मज़ा आ गया।

बढ़िया व्यवस्था

इतना आकर्षित किया कि पर्यटक खुद भी कलाकारों के साथ झूम उठे



हमे थोड़ी जल्दी भी थी लगभग 9 बज गए थे। हम वहां से जल्दी से निकले और पहुँच गए जैसलमेर संघ कार्यालय। वहां थोड़ी देर आराम किया और वहाँ के कार्यकर्ता नरेश जी दिनेश जी आदि हम छोड़ने स्टेशन तक पैदल शॉर्टकट रस्ते से लेकर गए हम लगभग 15 मिनट में स्टेशन पहुंचे। ट्रैन प्लेटफॉम पर लगी हुई थी। उसमे बैठे और पता ही नहीं लगा कब ट्रैन चल दी और हम रात भर सोये और अगले दिन शाम तक दिल्ली आ गए। 

यह यात्रा हमारी बहुत ही मज़ेदार रोचकता से भरपूर नए अनुभवों के साथ पूरी हुई।

Thursday, 25 August 2016

एक वीरान गांव कुलधरा


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लौद्रवा जैन मंदिर से बाहर आकर जैसे ही हम गाड़ी में बैठे तो राजेश ने ड्राइवर साहब से कहा कि भाई साहब अब कहां लेकर जा रहे हो.??

ड्राइवर साहब बोले:- अब हम कुलधरा गांव जा रहे हैं।

राजेश बोला:- क्या है कुलधरा गांव में.??

ड्राइवर साहब:- कुलधरा कोई बहुत बड़े नामी राजा या महाराजा का महल नहीं है, यह तो एक बंजर पड़ा हुआ गांव है। जिसमें कई सौ साल पहले पालीवाल ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस गांव को श्राप दे कर एक दिन में यह गांव खाली कर दिया।

राजेश:- तो ड्राइवर साहब यह बताओ उन्होंने अपने इस गांव को एक ही रात में खाली क्यों किया और श्राप भी क्यों दिया।

ड्राइवर साहब:- अरे.!! सारी बात यहीं जान लोगे तो वहां जाकर देखने में मजा नहीं आएगा। बस आप लोग इतना ध्यान रखना कि वहां कोई कंकर पत्थर मत उठाना और ना ही वहां पर किसी भी जगह पिशाब करना।

वाह.!! मैं तो चकित रह गया ड्राइवर साहब ने कुलधरा गांव को लेकर हमारी एक्साइटमेंट बढ़ा दी और मन में एक प्रकार का डर भी उत्पन्न कर दिया। लेकिन मन ऐसा कर रहा था जो जो ड्राइवर साहब ने काम करने के लिए मना किया है वह हम जरूर करेंगे।

एक पतली सी सड़क है दोनों ओर रेत के टीले हैं। रेत बहुत तेजी में उड़ रहा है, लेकिन हमारी गाड़ी के शीशे बंद है और ऐसी ऐसी भी चल रहा है तो रेत के दृश्य और हमारे बीच में शीशा है जो रेत को हमारी आंखों में जाने से बचा रहा है जिस कारण से हमारी घुमक्कड़ का आनंद बढ़ जाता है।

थोड़ी देर बाद हम कुलधरा गांव पहुंचते हैं। ड्राइवर साहब के कहे मुताबिक यह वास्तव में एक उजड़ा हुआ गांव है जैसे हम अंदर गए और हमने देखा जहां घर तो बने हुए हैं लेकिन द्वार टूटा हुआ है, जहां छत तो हैं लेकिन रहता कोई नहीं है। आखिर क्या हुआ होगा यहां.?? क्यों यहाँ गांव वालों ने एक दिन में सारा गांव खाली कर दिया।











kuldhara-abandoned-villageकुलधरा का प्रवेश द्वार











kuldhara-haunted-village-in-indiaवीरान पड़ा कुलधरा गांव











16-3सिर्फ खाली खंडहर



अरे यह क्या.!! यहां तो हमारे और कुछ दो चार पर्यटक के सिवा कोई नहीं दिख रहा लेकिन यहाँ महिलाओं के हंसने की आवाज कहां से आ रही है.?? ऐसा लग रहा है जैसे कोई आवाज लगा रहा है खैर हो सकता है हमारे मन का भ्रम हो।



वास्तव में यह जगह देखने लायक है इतना बड़ा बसा हुआ गांव एक दिन में वीरान हो गया।



आओ आपको यहां के बारे में कुछ बात बताते हैं।



वैसे तो राजस्थान का हर गांव, कस्बा और शहर अपनी आन-बान और शान के लिए भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मरुप्रदेश के रूप में ख्यात राजस्थान वास्तव में बहुत सी आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक प्रसंगों का धनी है। एक ओर हल्दी घाटी जहां महाराणा प्रताप और अकबर का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, तो वहीं जयपुर का जंतर मंतर जैसी वेधशाला है।



ऐसा लगता है, जैसे यहां का हर शहर अपने आप में कई कहानियों को अपने में समेटे हुए है। लेकिन इस गांव की एक अलग ही कहानी है, एक अलग ही दास्तां है। जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव अब एक बड़ा पर्यटक केंद्र बन चुका है और हर रोज सैकड़ों सैलानी यहां आते हैं। आज से लगभग 170 साल पहले कुलधरा गांव में बसे सैकड़ों लोग अपना घरबार छोड़कर रातों-रात ऐसे गायब हुए कि उनका नामो-निशान नहीं मिला।



यह गांव रातों रात क्यों खाली हुआ, किस समाज के लोग यहां रहते थे, आखिर इस गांव के लोग कहां चले गए। आज तक यह गांव दुबारा क्यों नही बस सका? ऐसे सैकड़ों सवाल हमारी तरह आपके मन में भी कौंध रहे होंगे। कुलधरा नाम का यह छोटा सा गांव। कहते हैं सन 1291 के आसपास रईस और मेहनती पालीवाल ब्राह्मणों ने 600 घरों वाले इस गांव को बसाया था। यह भी माना जाता है कि कुलधरा के आसपास 84 गांव थे और इन सभी में पालीवाल ब्राह्मण ही रहा करते थे।



ये ब्राह्मण ना सिर्फ मेहनती बल्कि वैज्ञानिक तौर पर भी सशक्त थे क्योंकि कुलधरा के अवशेषों से यह स्पष्ट अंकित होता है कि कुलधरा के मकानों को वैज्ञानिक आधार से बनाया गया था। पालीवाल ब्राह्मणों का समुदाय सामान्यत: खेती और मवेशी पालन पर निर्भर रहता था। जिप्संम की परत बारिश के पानी को भूमि में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल ब्राह्मण अपने खेतों को सींचते थे। आज के दौर में शायद किसी को किसी की परवाह नहीं, लेकिन जिस समय की बात हम यहां कर रहे हैं वो समय सिर्फ अपने नहीं बल्कि एक-दूसरे के बारे में सोचने का था। खुशहाल जीवन जीने वाले पालीवाल ब्राह्मणों पर वहां के दीवान सालम सिंह की बुरी नजर पड़ गई। सालम सिंह को एक ब्राह्मण लड़की पसंद आ गई और वह हर संभव कोशिश कर उसे पाने की कोशिश करने लगा। जब उसकी सारी कोशिशें नाकाम होने लगीं तब सालम सिंह ने गांव वालों को यह धमकी दी कि या तो पूर्णमासी तक वे उस लड़की को उसे सौंप दें या फिर वह स्वयं उसे उठाकर ले जाएगा। गांव वालों के सामने एक लड़की के सम्मान को बचाने की चुनौती थी। वह चाहते तो एक लड़की की आहुति देकर अपना घर बचाकर रख सकते थे लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। एक रात 84 गांव के सभी ब्राह्मणों ने बैठकर एक निर्णय लिया कि वे रातों रात इस गांव को खाली कर देंगे लेकिन उस लड़की को कुछ नहीं होने देंगे। बस एक ही रात में कुलधरा समेत आसपास के सभी गांव खाली हो गए। जाते-जाते वे लोग इस गांव को श्राप दे गए कि इस स्थान पर कोई भी नहीं बस पाएगा, जो भी यहां आएगा वह बरबाद हो जाएगा। कुलधरा की सुनसान और बंजर जमीन का पीछा वह श्राप आज तक कर रहा है। तभी तो जिसने भी उन मकानों में रहने या उस स्थान पर बसने की हिम्मत की वह बर्बाद हो गया।












11-5मकान बढ़िया बने है लेकिन रहता कोई नहीं है











151122185622_kuldhara_narendra_kaushik_640x360_narendrakaushik_nocreditएक कमरा ऐसा भी











img_20160826_105334_408छत की ओर ले जाती सीढ़ी











चारों445a6f7c-9a92-4743-b1d1-85c63422d5f0_l_styvpf तरफ वीराना











dsc04496एक मंदिर भी है











fb_img_1470071080158शी.. भूत आ जायेगा





कई लोगों ने यहाँ की इन बातों को मिथ्या समझा और यहाँ रात गुजारने की कोशिश करी। लेकिन वह वापिस लौट नही पाये और न ही यहाँ पता लगा की वह कहाँ चले गए। खैर हम भी यहाँ से लगभग दोपहर 3:45 पर निकल लिए सम (सैन ड्यून्स) के लिए। वहां अभी सन सेट होते हुए भी देखना है।





















एक वीरान गांव कुलधरा

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लौद्रवा जैन मंदिर से बाहर आकर जैसे ही हम गाड़ी में बैठे तो राजेश ने ड्राइवर साहब से कहा कि भाई साहब अब कहां लेकर जा रहे हो.??

ड्राइवर साहब बोले:- अब हम कुलधरा गांव जा रहे हैं।
राजेश बोला:- क्या है कुलधरा गांव में.??
ड्राइवर साहब:- कुलधरा कोई बहुत बड़े नामी राजा या महाराजा का महल नहीं है, यह तो एक बंजर पड़ा हुआ गांव है। जिसमें कई सौ साल पहले पालीवाल ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस गांव को श्राप दे कर एक दिन में यह गांव खाली कर दिया।
राजेश:- तो ड्राइवर साहब यह बताओ उन्होंने अपने इस गांव को एक ही रात में खाली क्यों किया और श्राप भी क्यों दिया।
ड्राइवर साहब:- अरे.!! सारी बात यहीं जान लोगे तो वहां जाकर देखने में मजा नहीं आएगा। बस आप लोग इतना ध्यान रखना कि वहां कोई कंकर पत्थर मत उठाना और ना ही वहां पर किसी भी जगह पिशाब करना।
वाह.!! मैं तो चकित रह गया ड्राइवर साहब ने कुलधरा गांव को लेकर हमारी एक्साइटमेंट बढ़ा दी और मन में एक प्रकार का डर भी उत्पन्न कर दिया। लेकिन मन ऐसा कर रहा था जो जो ड्राइवर साहब ने काम करने के लिए मना किया है वह हम जरूर करेंगे।
एक पतली सी सड़क है दोनों ओर रेत के टीले हैं। रेत बहुत तेजी में उड़ रहा है, लेकिन हमारी गाड़ी के शीशे बंद है और ऐसी ऐसी भी चल रहा है तो रेत के दृश्य और हमारे बीच में शीशा है जो रेत को हमारी आंखों में जाने से बचा रहा है जिस कारण से हमारी घुमक्कड़ का आनंद बढ़ जाता है।
थोड़ी देर बाद हम कुलधरा गांव पहुंचते हैं। ड्राइवर साहब के कहे मुताबिक यह वास्तव में एक उजड़ा हुआ गांव है जैसे हम अंदर गए और हमने देखा जहां घर तो बने हुए हैं लेकिन द्वार टूटा हुआ है, जहां छत तो हैं लेकिन रहता कोई नहीं है। आखिर क्या हुआ होगा यहां.?? क्यों यहाँ गांव वालों ने एक दिन में सारा गांव खाली कर दिया।

कुलधरा का प्रवेश द्वार

वीरान पड़ा कुलधरा गांव

सिर्फ खाली खंडहर

अरे यह क्या.!! यहां तो हमारे और कुछ दो चार पर्यटक के सिवा कोई नहीं दिख रहा लेकिन यहाँ महिलाओं के हंसने की आवाज कहां से आ रही है.?? ऐसा लग रहा है जैसे कोई आवाज लगा रहा है खैर हो सकता है हमारे मन का भ्रम हो।
वास्तव में यह जगह देखने लायक है इतना बड़ा बसा हुआ गांव एक दिन में वीरान हो गया।
आओ आपको यहां के बारे में कुछ बात बताते हैं।
वैसे तो राजस्थान का हर गांव, कस्बा और शहर अपनी आन-बान और शान के लिए भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मरुप्रदेश के रूप में ख्यात राजस्थान वास्तव में बहुत सी आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक प्रसंगों का धनी है। एक ओर हल्दी घाटी जहां महाराणा प्रताप और अकबर का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, तो वहीं जयपुर का जंतर मंतर जैसी वेधशाला है।
ऐसा लगता है, जैसे यहां का हर शहर अपने आप में कई कहानियों को अपने में समेटे हुए है। लेकिन इस गांव की एक अलग ही कहानी है, एक अलग ही दास्तां है। जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव अब एक बड़ा पर्यटक केंद्र बन चुका है और हर रोज सैकड़ों सैलानी यहां आते हैं। आज से लगभग 170 साल पहले कुलधरा गांव में बसे सैकड़ों लोग अपना घरबार छोड़कर रातों-रात ऐसे गायब हुए कि उनका नामो-निशान नहीं मिला।
यह गांव रातों रात क्यों खाली हुआ, किस समाज के लोग यहां रहते थे, आखिर इस गांव के लोग कहां चले गए। आज तक यह गांव दुबारा क्यों नही बस सका? ऐसे सैकड़ों सवाल हमारी तरह आपके मन में भी कौंध रहे होंगे। कुलधरा नाम का यह छोटा सा गांव। कहते हैं सन 1291 के आसपास रईस और मेहनती पालीवाल ब्राह्मणों ने 600 घरों वाले इस गांव को बसाया था। यह भी माना जाता है कि कुलधरा के आसपास 84 गांव थे और इन सभी में पालीवाल ब्राह्मण ही रहा करते थे।
ये ब्राह्मण ना सिर्फ मेहनती बल्कि वैज्ञानिक तौर पर भी सशक्त थे क्योंकि कुलधरा के अवशेषों से यह स्पष्ट अंकित होता है कि कुलधरा के मकानों को वैज्ञानिक आधार से बनाया गया था। पालीवाल ब्राह्मणों का समुदाय सामान्यत: खेती और मवेशी पालन पर निर्भर रहता था। जिप्संम की परत बारिश के पानी को भूमि में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल ब्राह्मण अपने खेतों को सींचते थे। आज के दौर में शायद किसी को किसी की परवाह नहीं, लेकिन जिस समय की बात हम यहां कर रहे हैं वो समय सिर्फ अपने नहीं बल्कि एक-दूसरे के बारे में सोचने का था। खुशहाल जीवन जीने वाले पालीवाल ब्राह्मणों पर वहां के दीवान सालम सिंह की बुरी नजर पड़ गई। सालम सिंह को एक ब्राह्मण लड़की पसंद आ गई और वह हर संभव कोशिश कर उसे पाने की कोशिश करने लगा। जब उसकी सारी कोशिशें नाकाम होने लगीं तब सालम सिंह ने गांव वालों को यह धमकी दी कि या तो पूर्णमासी तक वे उस लड़की को उसे सौंप दें या फिर वह स्वयं उसे उठाकर ले जाएगा। गांव वालों के सामने एक लड़की के सम्मान को बचाने की चुनौती थी। वह चाहते तो एक लड़की की आहुति देकर अपना घर बचाकर रख सकते थे लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। एक रात 84 गांव के सभी ब्राह्मणों ने बैठकर एक निर्णय लिया कि वे रातों रात इस गांव को खाली कर देंगे लेकिन उस लड़की को कुछ नहीं होने देंगे। बस एक ही रात में कुलधरा समेत आसपास के सभी गांव खाली हो गए। जाते-जाते वे लोग इस गांव को श्राप दे गए कि इस स्थान पर कोई भी नहीं बस पाएगा, जो भी यहां आएगा वह बरबाद हो जाएगा। कुलधरा की सुनसान और बंजर जमीन का पीछा वह श्राप आज तक कर रहा है। तभी तो जिसने भी उन मकानों में रहने या उस स्थान पर बसने की हिम्मत की वह बर्बाद हो गया।

मकान बढ़िया बने है लेकिन रहता कोई नहीं है

एक कमरा ऐसा भी

छत की ओर ले जाती सीढ़ी 

चारों तरफ वीराना

एक मंदिर भी है

शी.. भूत आ जायेगा


कई लोगों ने यहाँ की इन बातों को मिथ्या समझा और यहाँ रात गुजारने की कोशिश करी। लेकिन वह वापिस लौट नही पाये और न ही यहाँ पता लगा की वह कहाँ चले गए। खैर हम भी यहाँ से लगभग दोपहर 3:45 पर निकल लिए सम (सैन ड्यून्स) के लिए। वहां अभी सन सेट होते हुए भी देखना है।