Sunday, 9 October 2016

चटोरों का चांदनी चौक

जब आप चटोरों के चांदनी चौक में आओगे, तो आप यहां के खानों को नहीं भूल पाओगे। यहां चहल-पहल भरी गलियां मिलेंगी, जो विभिन्न व्यंजनों की महक से सरोबर होती हैं। व्यंजनों के कद्रदानों के लिए करीम जैसे रेस्तरां हैं, साथ ही मांसाहारी खानों के पुराने शौकीन हैं, वे मोती महल में बटर-चिकन का लुत्फ उठा सकते हैं।

स्ट्रीट फूड

चांदनी चौक को प्रायः भारत की फूड-कैपिटल भी कहा जाता है, जो अपने स्ट्रीट फूड के लिए प्रसिद्ध है। यहां अनेक प्रकार के स्नैक्स, विशेषकर चाट, मिलते हैं। 
टदि आप इनका आनंद लेना चाहते हैं तो सब-कुछ भूलकर इनके स्वाद और खुश्बुओं में खो जाएं। आप सभी यहां आएं...और मिल-जुलकर इनका आनंद उठाएं। चांदनी चौक में प्रतिदिन मेले जैसा माहौल रहता है। गलियों में हलवाई, नमकीन बेचने वालों तथा परांठे-वालों की कतार में दुकाने हैं।

बेहतर होगा कि आप परांठे वाली गली से शुरुआत करें, 1870 के दशक से,  जब यहां परांठों की दुकान खुली थी, तभी से यह स्थान चटोरों के स्थान के नाम से लोकप्रिय हो गया था। इस गली में भारत की कई नामी हस्तियां आ चुकी हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पं.जवाहरलाल नेहरु और उनके परिवारजन - इंदिरा गांधी और विजयलक्ष्मी पंडित यहां आ चुके हैं तथा यहां के परांठों का स्वाद ले चुके हैं। नियमित रूप से आने वाली हस्तियों में जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी बाजपेयी का नाम भी शामिल है।

यद्यपि इस गली में कई दुकानें अब नहीं रही हैं, आपको अचरज होगा कि इनके मालिक मैकडॉनाल्ड की फ्रैंचाइज़ी में ज्यादा रूचि दिखा रहे हैं - अब पुराने दौर की कुछ ही दुकानें यहां रह गई हैं। संभवतः इनमें सबसे पुरानी दुकान 1872 में स्थापित, पंडित गया प्रसाद-शिव चरण की है। अन्यों में पंडित देवी दयाल (1886) और कन्हैया लाल-दुर्गा प्रसाद (1875) की दुकानें अभी मौजूद हैं। परांठों को लोहे की कड़ाही में देसी घी में फ्राई किया जाता है। इन परांठों के साथ पोदीने की चटनी, केले व इमली की चटनी, सब्जी के अचार तथा आलू की सब्जी के साथ परोसा जाता है। आधा सदी पहले यहां कुछ किस्में जैसे - आलू परांठा, गोभी परांठा और मटर परांठा, क्रमशः आलू, फूलगोभी और मटर से भरकर बनाया जाता था। इनके अलावा कई नई किस्में जैसे मसूर की दाल, मैथी, मूली, पापड़, गाजर और मिक्स परांठे शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ महंगे परांठे भी हैं, जो पनीर, पोदीने, नींबू, मिर्ची, सूखे मेवों, काजू, किशमिश, बादाम, रबड़ी, खुर्चन केले, करेले, भिंडी तथा टमाटर के बनते हैं।




परांठे वाली गली




दिल्ली स्ट्रीट फूड का प्रमुख स्वादिष्ट व्यंजन यहां की चाट है। मूल चाट में उबले आलू के टुकड़े, करारी तली ब्रेड, दही भल्ले, छोले तथा स्वादिष्ट चाट मसाले मिले होते हैं। इस मिश्रण को मिर्च और सौंठ (सूखी अदरक और इमली की चटनी) से बनी चटनी ताजे हरा धनिया और मट्ठे की दही के साथ सजाकर परोसा जाता है। बहरहाल, इसके अलावा और भी मशहूर व्यंजन हैं, जिनमें आलू की टिक्की भी शामिल है। कुछ चाट की दुकानों जैसे - श्री बालाजी चाट भंडार (1462, चांदनी चौक; दोपहर से रात्रि 10 बजे तक) चांदनी चौक की संभवतः सबसे मशहूर और सर्वश्रेष्ठ दुकान है। हम विशेषकर चाट-पापड़ी, जिसमें कचालू की चटनी, खस्ता पापड़ी और सौंठ शामिल है, खाने के लिए आपसे आग्रह करेंगे। दूसरी मशहूर दुकान बिशन स्वरूप (1421, चांदनी चौक; प्रातः 10 बजे से रात्रि 10 बजे तक) की है, जो चांदनी चौक की बाईं लेन में है, इसका भी अपना विशेष आकर्षण, विशेष स्वाद है।
1923 से इस छोटे से स्टाल में केवल तीन आइटम : सुस्वादु आलू चाट, आलू के स्वादिष्ट कुल्ले और फ्रूट चाट बेचे जाते हैं।
आप लाला बाबू चाट भंडार (77, चांदनी चौक, मैक्डॉनाल्ड्स के निकट; प्रातः 11 बजे से रात्रि 10 बजे तक) भी जाना न भूलें। यहां स्वादिष्ट गोलगप्पों के साथ हींग वाला पाचक जलजीरा भरकर परोसा जाता है। साथ ही आलू और मटर की स्टफ कचौड़ी, गोभी मटर के समोसे, दही-भल्ले तथा मटर-पनीर की टिक्की यहां ज्यादा बिकती है। फ्रूट-चाट के लिए जुगल किशोर-रामजी लाल (23, दुजाना हाउस, चावड़ी बाज़ार, चांदनी चौक; प्रातः  10.30 बजे से रात्रि 10 बजे तक) सुविख्यात है, हालांकि यहां पाव-भाजी और आलू की टिक्की भी मिलती है किंतु फ्रूट चाट अधिक बिकती है। दही-भल्ले सदैव चाट के साथ नहीं दिए जाते बल्कि इसे नटराज दही भल्ले वाले के यहां मुख्य व्यंजन के तौर पर बेचा जाता है। दही-भल्ले उड़द की दाल की पिट्ठी से डीप फ्राई करके बनाए जाते हैं और दही-सौंठ के साथ परोसे जाते हैं। नटराज चांदनी चौक के मेट्रो स्टेशन के मोड़ पर भाई मतिदास चौक के निकट स्थित है।




एक अन्य सुस्वादु व्यंजन कचौड़ी है, जो पिसी दालों और आलू की करी के साथ परोसी जाती है, जो आपके मुंह में पानी ले आएगी। जंग बहादुर कचौड़ी वाला (1104, छत्ता मदन गोपाल, चांदनी चौक; प्रातः 10.30 बजे से रात्रि 8 बजे तक) संभवतः उड़द की दाल की कचौड़ी के लिए मशहूर है जिसे आलू की चटपटी सब्जी के साथ परोसा जाता है। यह जगह वस्तुतः जाने लायक है।


जंग बहादुर कचौड़ी वाला


मिठाई में सबसे पहला नाम, रबड़ी फलूदा का आता है। इसके लिए फतेहपुरी मस्जिद के निकट ज्ञानी दी हट्टी पर पधारें। अब यह आइसक्रीम पार्लर बन गया है जहां लीची और बबलगम तक के ज़ायके मिल सकते हैं। आइसक्रीम के अलावा यहां मिल्क-शेक, फ्रूट-शेक, आइसक्रीम-शेक और सनडीज़ भी उपलब्ध हैं। यदि आप कुल्फी (ज़ायकेदार जमाया गया दूध) के शौकीन हैं तो अजमेरी गेट की तरफ जाएं, सियाराम-नन्नूमल कुल्फी वाले (629, गली लोडन, अजमेरी गेट; प्रातः 7 जे से सायं 4 बजे तक) मशहूर नाम है। यहां की कुल्फी बेहद स्वादिष्ट है। आप किसी भी ज़ायके जैसे - केसर, पिस्ता, रोज़, केवड़ा, बनाना, मैंगो और अनार से बनी ज़ायकेदार कुल्फी उपलब्ध हैं अथवा इससे भी बेहतर होगा...इनमें से प्रत्येक का आनंद उठाएं!



वापस चांदनी चौक की बात करें तो आपको दरीबां कलां में प्रवेश करते समय दाहिने ओर प्राचीन एवं प्रख्यात जलेबीवाला दिखाई देगा। आप यहां गर्मा-गर्म जलेबी का आनंद उठाएं, जलेबी - एक मिष्ठान है जो मैदे के खमीर से बनाई जाती है, इसे सेंककर, चाश्नी में डुबाकर छाना जाता है। साथ ही, चहल-पहल से भरपूर जामा मस्जिद क्षेत्र की ओर जाना भी न भूलें।




जामा मस्जिद के गेट नं. 1 के आगे उर्दू बाज़ार और अंदर जाती मटियामहल नामक सड़क पर भी विभिन्न व्यंजनों के स्टाल देखने को मिलेंगे। यहां आपको मछली, खुश्बूदार कबाब और फ्राइड चिकन की महक की नुभूते होगी। यहां आपको दुकानदार रुमाली रोटी (पतली रोटी) में लिपटे सस्ते दाम वाले कबाब और टिक्का (भैंस के मांस से बने) बेचते दिखेंगे। यहां शहर का सबसे अच्छा मटन-बर्राह बेचा जाता है। यह एक ऐसा स्थान है जहां आपको निहारी और पाया मिल सकते हैं, जो प्रातः 8.30  बजे तक बिक जाते हैं। अन्य मुख्य व्यंजनों में इस्टु, मटन कोरमा, शामी कबाब और शाहजहानी कोरमा शामिल है।

बाजार जामा मस्जिद (उर्दू बाजार)

जामा मस्जिद से चावड़ी बाजार की ओर जाएँ तो वर्षा बुल्ला चौक पर दायीं तरफ छत्ता शाहजी है। यहाँ बैठते है लोटन छोले वाले जिनके छोले इतने स्वादिस्ट इतने मिर्चीदार के आपके शरीर से पसीना छूट जायेगा लेकिन आप पूरे खाये बिना रह भी नहीं पाएंगे।

लोटन छोले वाला


चांदनी चौक स्थित घंटेवाला हलवाई 200 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यहां मिठाइयां शुद्ध देसी घी में तैयार की जाती हैं। सोहन हलवा पापड़ी, पिस्ता समोसा और बादाम की बर्फी- धरती पर वस्तुतः जैसे स्वर्गिक आनंद की अनुभूति देते हैं। 



दिल्ली में बटर चिकन
वैसे तो मैं पूर्णतः शाकाहारी हूँ लेकिन अनेकों जगह से मिली जानकारी के आधार पर आपको बता रहा हूँ बटर चिकन की शुरुआत 1950 के दशक में मोती महल, दरिया गंज में हुआ था। यह अपने तंदूरी चिकन के लिए मशहूर है। यहां के खानसामे चिकन जूस में मक्शन और टमाटर मिक्स करके इसे रिसाइकिल करते हैं। इसे संयोग कहिए या डिजाइन, इस चटनी को तंदूरी चिकन के टुकड़ों के साथ सजाकर परोसा जाता है। इस प्रकार इस बटर चिकन का आविष्कार हुआ और पूरे विश्व में यह मन-पसंदीदा व्यंजन बन गया। बटर चिकन मक्खन और गाढ़े लाल टमाटर की ग्रेवी से बनाया जाता है। इसका स्वाद थोड़ा मीठा होता है। मुंह में घुल जाने वाला बटर चिकन तंदूरी रोटी या नान के साथ खाया जाता है।



आप कहीं मत जाइयेगा ऐसे ही बने रहिये मेरे साथ, भारत के कोने-कोने में छुपे अनमोल ख़ज़ानों में से आपको रूबरू करवाते रहेंगे।
तब तक खुश रहिये, खाते पीते रहिये और घूमते रहिये।
आपका हमसफ़र आपका दोस्त
हितेश शर्मा

Thursday, 6 October 2016

चाँदनी चौक की गलियां

वैसे तो मेरा जन्म भी पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक क्षेत्र दरियागंज में हुआ। इस कारण से कई मित्रों का कहना था कि हितेश भाई आप हमें पुरानी दिल्ली के बारे में कुछ बताओ। बड़े चर्चे सुने है पुरानी दिल्ली की गलियों के, चांदनी चौक की गलियों में बड़ा इतिहास छुपा है। सुना है चटोरों की जान बस्ती है चांदनी चौक में। तो मैंने कहा यार जानकारी तो आजकल इंटरनेट पर ही मिल जाती है। फिर वह कहने लगे आप वहां के रहने वाले हैं आपसे जानकारी कुछ अलग ही मिलेगी तो उनके आग्रह पर पुरानी दिल्ली की गलियों की छोटी सी जानकारी आपके सामने है।

कहते हैं पहले दिल्ली केवल 6 गेटों में थी। दिल्ली गेट, तुर्कमान गेट, अजमेरी गेट, लाहौरी गेट, मोरी गेट, और कश्मीरी गेट। इन 6 गेटों में बसी दिल्ली को ही दिल्ली कहा जाता था बाकी सब आसपास जंगल हुआ करता था। लेकिन आज तो हम जानते हैं दिल्ली कितनी बड़ी हो गई है लेकिन इन 6 गेटों वाली दिल्ली को अब पुरानी दिल्ली कहा जाने लगा इसकी शुरुआत दिल्ली गेट से होती है। कहते हैं दिल्ली गेट दिल्ली में प्रवेश करने का मुख्य द्वार हुआ करता था।

दिल्ली गेट

बाद में मुगलों द्वारा फिरोज शाह कोटला व खूनी दरवाजे का निर्माण करवाया गया। फिरोज शाह कोटला ऐसी जगह है जो हमारे देश के क्रांतिकारियों का केंद्र भी रही है। यहां किले के अवशेष और घूमने लायक मनमोहक बगीचा है।

फ़िरोज़शाह कोटला




खूनी दरवाजा

यहां से थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो हम राजघाट पहुंच जाते हैं जहां गांधी जी की समाधि है। फिर वापिस बाजार दिल्ली गेट से होते हुए हम पहुंचे हैं तिराहा बहरम खान इससे आगे बढ़ते हुए हम पहुंचते हैं चितली कबर, सस्ते कपड़े आदि लेने के लिए यह बाजार मशहूर है आप यहां रात के 2:30  3:00 बजे भी चहल-पहल देख सकते हैं। यहां से नजर उठा कर देखो तो सामने जामा मस्जिद नजर आती है।
राजघाट, गांधी समाधि

जामा मस्जिद



जामा मस्जिद से बांयी ओर चले तो हम पहुंचते हैं चावड़ी बाजार की गलियों में। यह संकरी गलियां काफी व्यस्त रहती है और यहाँ सैनेट्री का सामना थोक में मिलता है। यहां से सीधे चले जाओ तो चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन आ जाता है और बांयी और मुङो तो हम नई सड़क पहुंच जाते हैं। कहते हैं नई सड़क कागज की एशिया की सबसे बड़ी मार्केट मानी जाती है। यहां से सीधा चले तो सामने दिल्ली की शान टाउन हॉल दिखाई पड़ता है।

चावड़ी बाजार की गलियां

टाउन हॉल


अब हम चांदनी चौक में मैं प्रवेश कर चुके हैं। यहाँ सेंकडो गलियां है। जिनका नाम जिन्होंने बैठे तो बहुत समय लगेगा लेकिन फिर भी मैं आपको कुछ नाम बताता हूं जैसे दरीबा कला जो दिल्ली का सराफा बाजार माना जाता है। यहाँ कूंचा सेठ, गली पीपल वाली, धर्मपुरा हनुमान गली, माता गली, जोगीवाड़ा, मालीवाड़ा, गली गुलियांन, दुर्गा गली, कटरा नील, गली परांठे वाली छत्ता शाहजी आदि।




तो अभी हम टाउनहाल पर खड़े है सीधे हाथ की तरफ जाएँ तो हम पहुँचते है गुरुद्वारा शीश गंज। गुरूद्वारा शीश गंज साहिब, दिल्‍ली के नौ ऐतिहासिक गुरूद्वारों में से एक है। इस गुरूद्वारे का रोचक इतिहास है। यह गुरूद्वारा, सिक्‍खों के नौवें गुरू, गुरू तेग बहादुर सिंह की स्‍मृति में बनवाया गया था। इसी जगह गुरू तेग बहादुर को मौत की सजा दी गई थी, जब उन्‍होने मुगल बादशाह औरंगजेब के इस्‍लाम धर्म को अपनाने के प्रस्‍ताव को ठुकरा दिया था और इंकार कर दिया था।
शकों बाद, गुरू तेग बहादुर के कट्टर अनुयायी बाबा बघेल सिंह ने इस जगह को ढूंढ निकाला जहां गुरू जी को मौत की सजा मिली थी, और उन्‍होने गुरू जी के सम्‍मान में एक भव्‍य गुरूद्वारे का निर्माण करवा दिया।


गुरुद्वारा, शीश गंज


गुरुद्वारे से आगे चले तो सीधे हाथ पर पड़ती है कैमरा मार्किट, साइकिल मार्किट और घडी मार्किट, बांयी हाथ पर पड़ता है भागीरथ पैलेस, यह मार्किट दवाई और बिजली के सामान की थोक मार्किट है। यहाँ सामान लेने पुरे देश से व्यापारी आते है। अब थोड़ा सा आगे और बड़े तो सीधे हाथ पर पड़ता है गौरी शंकर मंदिर। कहते है यह मंदिर 800 साल पुराना है इस मंदिर को कॉस्मिक पिलर या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इस मंदिर को एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर के द्वारा बनवाया गया था जो भगवान शिव का परम भक्त थे।
गौरी शंकर मंदिर नाम के अनुरूप भगवान शिव को समर्पित है और शैव के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। यहां एक शिवलिंग है जो चांदी से बने सांपों से घिरा हुआ है और एक लौकिक स्तंभ,ब्रह्मांड या जीवन के केंद्र का प्रतिनिधित्व करता है।

गौरी शंकर मंदिर


चांदनी चौक का व्यस्त बाजार


इसके साथ ही है जैन लाल मंदिर इसका निर्माण 1526 में हुआ था। वर्तमान में इसकी इमारत लाल पत्थरों की बनी है। इसलिए यह लाल मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां कई मंदिर हैं लेकिन सबसे प्रमुख मंदिर भगवान महावीर का है जो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। यहां जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा भी स्थापित है। जैन धर्म के अनुयायियों के बीच यह स्थान बहुत लोकप्रिय है। यहां का शांत वातावरण लोगों का अपनी ओर खींचता है।

मुगल साम्राज्य में मंदिरों के शिखर बनाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए इस मंदिर का कोई औपचारिक शिखर नहीं था। बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति उपरांत इस मंदिर का पुनरोद्धार हुआ।

जैन लाल मंदिर




और यहाँ से सामने देखें तो नज़र आता है लाल किला इसके इतिहास में नहीं जाऊंगा आपको पता ही है सारा।
वापिस आयें तो टाउन हॉल से थोड़ा सा आगे बांयी हाथ पर है बल्ली मारन यह जूते, चप्पल की थोक मार्किट है यहाँ से आगे जाएँ तो नज़र आती है फतेहपुरी मस्जिद और यहाँ से सीधे चले जाओ तो खारी बावली होते हुए सादर पहुँच जाते है।



खड़ी बावली की एक दुकान

फतेहपुरी मस्जिद


लेकिन पुरानी दिल्ली का जिक्र हो और ऐतिहासिक दिल्ली के सबसे पुराने रेलवे स्टेशन का जिक्र ही न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। फतेहपुरी चौक से सीधे जाकर भाई मति दास चौक से बांयी मुड़े तो सामने नज़र आता है पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन। और उसके सामने है दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी।


दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन

अगले भाग में जारी...
आगे के भाग में आपको बताएँगे चटोरे चांदनी चौक के बारे में तब तक आप कहीं मत जाइयेगा ऐसे ही बने रहिये मेरे साथ, भारत के कोने-कोने में छुपे अनमोल ख़ज़ानों में से आपको रूबरू करवाते रहेंगे।
तब तक खुश रहिये और घूमते रहिये।
आपका हमसफ़र आपका दोस्त
हितेश शर्मा

Thursday, 29 September 2016

सपनो का शहर शिमला: भाग 2

आपने अब तक पढ़ा कि कल हम कालीबाड़ी मंदिर, मॉल, और रिज गए और लौटते वक्त हमे शाम के 8 बज गए फिर हम खाना खा के सो गए। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

लगभग सुबह 5 बजे उठा तो रजाई से बाहर निकलते ही काफी ठण्ड लगने लगी। लेकिन जल्दी से मुह हाथ धोया और सुबह लगभग 6 बजे ही निकल दिए फिर वही रेलवे स्टेशन तो हमारे रस्ते का मिडवे बन गया था रिज़ पर होते हुए हम पहुच गए जाखू मंदिर के रस्ते पर। मनमोहक द्रश्य से गुजरते हुए हम पहुंचे जाखू मंदिर। इतनी ऊँची मूर्ति मैंने अपने जीवन में पहली बार देखी आनंद आ गया

कहते है कि जब हनुमन जी संजीवनी बूटी लेने के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने ऋषि राक्ष को तपस्या करते देखा। तो वह संजीवनी का पता जानने के लिए इस पर्वत पर उतरे और उन्हें (राक्ष+याक+याकू=जाखू) नाम पड़ा। आप कभी शिमला आयें तो यहाँ जरुर आयें।

रिज पर फहरता भारत की शान तिरंगा 


रिज से पहले मैं 

जाखू का रास्ता 

जाखू मंदिर मार्ग की सीढियों पर मैं 

मंदिर का प्रवेश द्वार पर मैं 




इतने मनमोहक द्रश्य के आप घंटो इन्हें निहारते रहेंगे 

कुछ इन्हें भी जरुर खिला जी हमने तो चने दिए थे 

जय बजरंग बलि 
जाखू के बाद मैं पैदल ही चल पड़ा और पहुँच गयेया इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज यह पहले राष्ट्र्पति निवास हुआ करता था मैं आपको इतिहास के बारे में तो नहीं बताऊंगा लेकिन है इतनी मस्त जगह जिसका कोई जवाब नहीं। इसमें सुन्दर गार्डन है और मियुजियम में कई एतिहासिक जानकारी मिलती है। अंदर फोटोग्राफी मना थी नहीं तो आपको अंदर की फोटो भी दिखाते। 




इसके बाद 103 के पॉइंट तक मैं पैदा आया और यहाँ से पुराने बस अड्डे की बस पकड़ी फिर वहां से विकास नगर जिसको न्यू शिमला भी कहा जाता है वहाँ गया। यहाँ मैं अपने भाई का स्कूल देखने आया था। मतलब जो काम मुझे पहले करना था वो मैं सबसे आखिरी में कर रहा हूँ। यह सरस्वती विद्या मंदिर, हिम रश्मि परिसर बहुत ही सुन्दर स्कूल है यहाँ प्रधानाचार्य जी से बात की तो अब यह फाइनल हो गया की छोटा भाई अब यहीं पढ़ेगा तो प्रिंसिपल साहब ने कहा के सेशन शुरू हो गया है भाई को जल्दी ले आओ





स्कूल देखने के बाद मैं कार्यालय आ गया तो 4 बज रहे थे फिर मैंने प्लान किया कि आज ही दिल्ली के लिए निकलना चाहिए तो लगभग 6 बजे तक नए बास अड्डे से कालका की बस पकड़ी और वहां से कालका मेंल से दिल्ली आ गया
बस इतनी सी थी ये कहानी।